श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा॥

 

Vakra-Tunndda Maha-Kaaya Suurya-Kotti Samaprabha |
Nirvighnam Kuru Me Deva Sarva-Kaaryessu Sarvadaa ||

 

O Lord Ganesha, of Curved Trunk, Large Body, and with the Brilliance of a Million Suns,
Please Make All my Works Free of Obstacles, Always.

 

मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्तानि नाहं
श्रोत्रजिह्वे घ्राणनेत्रे
व्योम भूमिर्न तेजो वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥१॥

प्राणसंज्ञो वै पञ्चवायुः
वा सप्तधातुः वा पञ्चकोशः
वाक्पाणिपादं चोपस्थपायु
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥२॥

मे द्वेषरागौ मे लोभमोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः
धर्मो चार्थो कामो मोक्षः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥३॥

पुण्यं पापं सौख्यं दुःखं
मन्त्रो तीर्थं वेदा यज्ञाः
अहं भोजनं नैव भोज्यं भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥४॥

मृत्युर्न शङ्का मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता जन्मः
बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यं
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥५॥

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥६॥

I am not mind, nor intellect, nor ego, nor the reflections  of inner self. I am not the five senses. I am beyond that. I am not the ether, nor the earth, nor the fire, nor the wind (i.e. the five elements). I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva, love and pure consciousness.

Neither can I be termed as energy (Praana), nor five types of breath (Vaayu), nor the seven material essences (dhaatu), nor the five coverings (panca-kosha). Neither am I the five instruments of elimination, procreation, motion, grasping, or speaking. I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva, love and pure consciousness.

I have no hatred or dislike, nor affiliation or liking, nor greed, nor delusion, nor pride or haughtiness, nor feelings of envy or jealousy. I have no duty (dharma), nor any money, nor any desire (refer: kama), nor even liberation (refer: moksha). I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva, love and pure consciousness.

I have neither virtue (punya), nor vice (paapa). I do not commit sins or good deeds, nor have happiness or sorrow, pain or pleasure. I do not need mantras, holy places, scriptures, rituals or sacrifices (yajna). I am none of the triad of the observer or one who experiences, the process of observing or experiencing, or any object being observed or experienced. I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva, love and pure consciousness.

I do not have fear of death, as I do not have death. I have no separation from my true self, no doubt about my existence, nor have I discrimination on the basis of birth. I have no father or mother, nor did I have a birth. I am not the relative, nor the friend, nor the guru, nor the disciple. I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva, love and pure consciousness.

I am all pervasive. I am without any attributes, and without any form. I have neither attachment to the world, nor to liberation. I have no wishes for anything because I am everything, everywhere, every time, always in equilibrium. I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva, love and pure consciousness.

 

 

Adi Shankaracharya in 8th century AD created Nirvan Shatkam in honor of Shiv.

Hanuman.Chalisa
Shri Hanuman Chalisa

 

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥

॥चौपाई॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥

राम दूत अतुलित बल धामा ।
अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥

महाबीर बिक्रम बजरङ्गी ।
कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥

कञ्चन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुण्डल कुञ्चित केसा ॥४॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेउ साजै ॥५॥

सङ्कर सुवन केसरीनन्दन ।
तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥६॥

बिद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥७॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लङ्क जरावा ॥९॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचन्द्र के काज सँवारे ॥१०॥

लाय सञ्जीवन लखन जियाये ।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥

रघुपति कीह्नी बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥

सहस बदन तुह्मारो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥१३॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।
राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥

तुह्मरो मन्त्र बिभीषन माना ।
लङ्केस्वर भए सब जग जाना ॥१७॥

जुग सहस्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥

दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुह्मरे तेते ॥२०॥

राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥

सब सुख लहै तुह्मारी सरना ।
तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥

आपन तेज सह्मारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥

भूत पिसाच निकट नहिं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥

नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥२५॥

सङ्कट तें हनुमान छुड़ावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥

सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥

और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥

चारों जुग परताप तुह्मारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥

साधु सन्त के तुम रखवारे ।
असुर निकन्दन राम दुलारे ॥३०॥

अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥

राम रसायन तुह्मरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥

तुह्मरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥

अन्त काल रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥३४॥

और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥

सङ्कट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥

जय जय जय हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥

जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बन्दि महा सुख होई ॥३८॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥

॥दोहा॥

पवनतनय सङ्कट हरन मङ्गल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥

shiv.Chalisa
Shri Shiv Chalisa

 

।।दोहा।।

श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला।

सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके।

कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये।

मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।

छवि को देख नाग मुनि मोहे॥1॥

 

मैना मातु की ह्वै दुलारी।

बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।

करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।

सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ।

या छवि को कहि जात न काऊ॥2॥

 

देवन जबहीं जाय पुकारा।

तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी।

देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ।

लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा।

सुयश तुम्हार विदित संसारा॥3॥

 

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।

सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी।

पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं।

सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई।

अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥4॥

 

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला।

जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई।

नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा।

जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी।

कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥5॥

 

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।

कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।

भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी।

करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।

भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥6॥

 

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।

यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।

संकट से मोहि आन उबारो॥
मातु पिता भ्राता सब कोई।

संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी।

आय हरहु अब संकट भारी॥7॥

 

धन निर्धन को देत सदाहीं।

जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी।

क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन।

मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।

नारद शारद शीश नवावैं॥8॥

 

नमो नमो जय नमो शिवाय।

सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई।

ता पार होत है शम्भु सहाई॥
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी।

पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई।

निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥9॥

 

पण्डित त्रयोदशी को लावे।

ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा।

तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।

शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे।

अन्तवास शिवपुर में पावे॥10॥

 

कहे अयोध्या आस तुम्हारी।

जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

 

॥दोहा॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

ॐ कालभैरवाय नम:।‘

ॐ भयहरणं च भैरव:।‘

‘ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।‘

 ’ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:।‘

 ’ॐ भ्रां कालभैरवाय फट्‍।‘

Kaal.Bhairav